Kabir Ki sakhi Class 10 Vyakhya and Summary
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व्याख्या -कबीर
साखी
कबीर
साखी का सार
‘साखी ‘ दोहा छंद है, जिसका लक्षण है – १३ और ११ मात्रा के विश्राम से २४ मात्रा और अंत में जगण ।’साखी ‘ शब्द ‘ साक्षी ‘ शब्द का ही तद्भव रूप है। साक्षी का अर्थ होता है -प्रत्यक्ष ज्ञान अर्थात जो ज्ञान सबको स्पष्ट दिखाई दे। यह प्रत्यक्ष ज्ञान गुरु द्वारा शिष्य को प्रदान किया जाता है।
कबीर की साखियों में नीति संदेश हैं, यह साखियाँ हमें जहाँ व्यावहारिक ज्ञान देती हैं, वहीं हमें जीवन मूल्यों से भी परिचित करवाती हैं | कबीर की साखियों में ईश्वर प्रेम के महत्त्व को दर्शाया गया हैं।
पहली साखी में बताया गया है कि मीठी वाणी दूसरों को सुख और अपने तन को शीतलता पहुँचाती है।
दूसरी साखी में कबीरदास जी कहते हैं कि ईश्वर को मंदिरों और तीर्थों में ढूँढने की आवश्यकता नहीं है उसे अपने मन में ढूँढना चाहिए, ईश्वर का वास तो मनुष्य के हृदय में ही है।
चौथी साखी में अज्ञान रूपी अहंकार के मिटने पर ईश्वर प्राप्ति के महत्त्व पर प्रकाश डाला है।
पाँचवी साखी में कबीरदास जी संसार को सुखी और स्वयं को दुखी बताते हुए कहते हैं कि प्रभु को पाने की आशा उन्हें संसार के लोगो से अलग करती है। राम (ईश्वर) के वियोग में व्याकुल व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता, अगर रहता भी है तो उसकी स्थिति पागलों जैसी हो जाती है।
छठी साखी में कबीरदास जी ने निंदक के महत्त्व को प्रतिपादित किया है । निंदा करने वालों के सामीप्य से मनुष्य के स्वभाव में सकारात्मक परिवर्तन आ जाता हैं।
सातवीं साखी में विद्या के साथ -साथ व्यावहारिकता की आवश्यकता पर बल दिया गया है ।
आठवीं साखी में कबीर सांसारिक मोहमया को त्यागने पर बल देते हुए कहते हैं कि यदि ज्ञान प्राप्त करना है तो मोह – माया का त्याग करना पड़ेगा |
साखियों की व्याख्या
ऐसी बाँणी बोलिये ,मन का आपा खोइ।
अपना तन सीतल करै ,औरन कौ सुख होइ।।
बाँणी – बोली
आपा – घमंड, अहंकार
खोइ – खोना, त्याग करना
सीतल – शीतल, ठंडा , अच्छा
तन – शरीर
औरन – दूसरों को
होइ -होना
व्याख्या – इस साखी में कबीर ने मीठी बोली बोलने और दूसरों को दुःख न देने की बात कही है। कबीरदास जी बात करने की कला के महत्त्व को दर्शाते हुए कहते है कि हमें अपने मन का अहंकार त्याग कर ऐसी भाषा का प्रयोग करना चाहिए जिससे हमारे मन को शांति मिले, हमारा अपना तन- मन भी स्वस्थ रहे और दूसरों को भी सुख प्राप्त हो अर्थात दूसरों को भी कोई कष्ट न हो ।
कस्तूरी कुंडली बसै ,मृग ढूँढै बन माँहि।
ऐसैं घटि- घटि राँम है , दुनियाँ देखै नाँहिं।pics
कस्तूरी – एक सुगंधित पदार्थ
कुंडली – नाभि
मृग – हिरण
वन – जंगल
माँहि – भीतर
घटि घटि – कण-कण में
व्याख्या – कबीरदास जी ईश्वर की महत्ता स्थापित करने हेतु , कस्तूरी का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहते है कि कस्तूरी हिरण की नाभि में स्थित होती है परन्तु वह इस बात से अनजान होता है और उसे खोजने के लिए जंगल-जंगल भटकता रहता है। कुछ ऐसी ही स्थिती मनुष्य की है ईश्वर प्रत्येक मनुष्य के हृदय में निवास करते हैं परन्तु मनुष्य इस बात से अनजान हैं । संसार के कण-कण में ईश्वर विद्यमान है और मनुष्य इस बात से बेखबर ईश्वर को देवालयों और तीर्थों में ढूँढता है। कबीर जी कहते है कि अगर ईश्वर को ढूँढना ही है तो अपने मन मंदिर में ढूँढो।
जब मैं था तब हरि नहीं ,अब हरि हैं मैं नांहि।
सब अँधियारा मिटी गया , जब दीपक देख्या माँहि।।
मैं – अहम् ,अहंकार
हरि – परमेश्वर
अँधियारा – अज्ञान का अंधकार
मिटि गया – मिट गया
देख्या – देखना
व्याख्या – इसमें कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक मनुष्य के मन में अहंकार हावी रहता है तब तक उसे ईश्वर की प्राप्ति नहीं हो सकती । मन में अहम् या अहंकार के मिट जाने के बाद ही मन में परमेश्वर का वास संभव है। कबीर जी कहते हैं कि जब इस हृदय में ‘मैं ‘ अर्थात मेरा अहंकार था तब इसमें परमेश्वर का वास नहीं था परन्तु अब हृदय में अहंकार नहीं है तो इसमें प्रभु का वास है। अहंकार का त्याग करने पर ही ईश्वर की प्राप्ति व सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है ।
सुखिया सब संसार है , खायै अरु सोवै।
दुखिया दास कबीर है , जागै अरु रोवै।।
सुखिया – सुखी
खायै – खाता है
अरु – और
सोवै – सोता है
दुखिया – दुःखी
रोवै – रोता है
व्याख्या – कबीरदास जी कहते हैं कि पूरा संसार विषय वासनाओं और मस्ती में लगा हुआ है । संसार के लोग स्वयं को सुखी मानते हैं, वे केवल खाते है, सोते हैं और चिंतारहित हैं । कबीरदास जी अज्ञान रूपी अंधकार में सोए हुए मनुष्यों को देखकर दुःखी हैं और रो रहे हैं।
कबीर कहते हैं कि संसार के लोग अज्ञान रूपी अंधकार में डूबे हुए हैं अपनी वास्तविकता से अनजान सोए हुए हैं। ये सब देखकर कबीर दुखी हैं और वे रो रहे हैं। वे प्रभु को पाने की आशा में हमेशा चिंता में जागते रहते हैं। इस साखी में कबीर ने चिंतनशील व्यक्ति के दुख और व्याकुलता का चित्रण किया है।
बिरह भुवंगम तन बसै , मंत्र न लागै कोइ।
राम बियोगी ना जिवै ,जिवै तो बौरा होइ।।
बिरह – वियोग, बिछड़ने का गम
भुवंगम -भुजंग, सांप
तन – शरीर
बसै – बसता है
मंत्र – उपाय
जिवै – जीता हैं
बौरा – पागल
होइ – हो जाता है
व्याख्या – कबीर कहते हैं कि विरह रूपी साँप जिस मनुष्य के शरीर में निवास करता है उस पर किसी प्रकार के उपाय या मंत्र का प्रभाव नहीं होता अर्थात् ईश्वर के वियोग में मनुष्य जीवित नहीं रह सकता और अगर रह भी जाता है तो वह पागल हो जाता है। कबीरदास जी कहते हैं कि जब मनुष्य के मन में अपनों के बिछड़ने का गम साँप बनकर निवास करने लगता है तो उस पर कोई मन्त्र असर नहीं करता ।
उसी तरह राम अर्थात ईश्वर के वियोग में मनुष्य जीवित नहीं रह सकता और यदि वह जीवित रहता भी है तो उसकी स्थिति पागलों जैसी हो जाती है। यहाँ कवि ने वियोग की तुलना साँप से की है तथा ईश्वर वियोगी की दयनीय स्थिती का चित्रण किया है।
निंदक नेड़ा राखिये , आँगणि कुटी बँधाइ।
बिन साबण पाँणीं बिना , निरमल करै सुभाइ।।
निंदक – बुराई करने वाला
नेड़ा – निकट
आँगणि – आँगन
कुटी – कुटिया
साबण – साबुन
निरमल – साफ़
सुभाइ – स्वभाव
व्याख्या – इसमें कबीरदास जी निंदा करने वाले व्यक्तियों को हमेशा आस – पास रखने की सलाह देते हैं, वह कहते हैं कि हो सके तो उनके लिए अपने पास ही रहने का उचित प्रबंध कर देना चाहिए ताकि आपके स्वभाव में सकारात्मक परिवर्तन आ सके ताकि हम उनके द्वारा बताई गई गलतियों को सुधार सकें और अपना व्यवहार सुदृढ़ बना सके । इससे हमारा स्वभाव बिना साबुन और पानी की मदद के ही निर्मल हो जाएगा ।
पोथी पढ़ि – पढ़ि जग मुवा , पंडित भया न कोइ।
ऐकै अषिर पीव का , पढ़ै सु पंडित होइ।
पोथी – पुस्तक
मुवा – मरना
भया – बनना
अषिर – अक्षर
पीव – प्रिय
व्याख्या – कबीरदास जी कहते हैं कि मोटी-मोटी पुस्तक और धार्मिक ग्रंथ पढ़ने से कोई ज्ञानी नहीं बन जाता, इसमें कबीर पुस्तकीय ज्ञान को महत्त्व न देकर ईश्वर – प्रेम को महत्त्व देते हैं। कबीर कहते है कि इस संसार में मोटी – मोटी किताबें पढ़कर कई मनुष्य मर गए परन्तु कोई भी ज्ञानी नहीं बन सका, जो व्यक्ति ईश्वर -प्रेम का एक अक्षर भी पढ़ लेता है तो वह बड़ा ज्ञानी बन जाता है । ईश्वर के सत्य और सत्ता को जान लेने वाला व्यक्ति ही वास्तविक ज्ञानी होता है । पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा व्यावहारिक ज्ञान ही उत्तम है।
हम घर जाल्या आपणाँ , लिया मुराड़ा हाथि।
अब घर जालौं तास का, जे चलै हमारे साथि।।
जाल्या – जलाया
आपणाँ – अपना
मुराड़ा – जलती हुई लकड़ी , ज्ञान
जालौं – जलाऊँ
तास का – उसका
जे – जो
साथि – साथ
व्याख्या – कबीरदास जी कहते हैं कि पहले हमने अपना घर जलाया अर्थात सांसारिक विषय वासनाओं, मोह – माया का त्याग किया, अब भक्ति प्रेम और भाईचारे का संदेश उसे भी देंगे जो हमारे साथ चलेगा। इसमें कबीर मोह – माया रूपी घर को जला कर अर्थात त्याग कर ज्ञान को प्राप्त करने की बात करते हैं।
कबीर जी कहते हैं कि उन्होंने अपने हाथों से अपना घर जला दिया है अर्थात उन्होंने मोह -माया रूपी घर को जला कर ज्ञान प्राप्त कर लिया है। अब उनके हाथों में जलती हुई मशाल ( लकड़ी ) है यानि ज्ञान है। अब वे उसका घर जलाएँगे जो उनके साथ चलना चाहता है अर्थात उसे भी मोह – माया से मुक्त होना होगा जो ज्ञान प्राप्त करना चाहता है।
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