Vyakhya-Rahim Ke Dohe,व्याख्या -रहीम के दोहे, Class 6, Malhar,NCERT
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vyakhya
1
रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।
जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तलवारि।।
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शब्दार्थ-
रहिमन – रहीम (कवि का नाम)
देखि – देखकर
बड़ेन – बड़े लोगों को
लघु – छोटा, तुच्छ
न दीजिये डारि – मत छोड़िए, त्याग मत कीजिए
काम आवे – उपयोग में आता है
कहा करे तलवारि – तलवार क्या कर सकती है (तलवार से सिलाई नहीं हो सकती
भावार्थ- किसी भी छोटी चीज़ को बेकार मत समझिए, क्योंकि हर चीज़ का अपना महत्व होता है। जैसे कि जब सिलाई करनी हो तो सुई की ही जरूरत होती है, तलवार से वह काम नहीं हो सकता।
अर्थात् बड़ों का साथ मिलने पर छोटों को नहीं भूलना चाहिए। सभी का अपना एक अलग महत्त्व है।
2
तरुवर फल नहिं खात हैं सरवर पियहिं न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान।।
शब्दार्थ-
तरुवर – वृक्ष (पेड़)
फल नहिं खात हैं – अपने फल खुद नहीं खाते
सरवर – तालाब
पियहिं न पान – अपना पानी खुद नहीं पीते
कहि रहीम – रहीम कहते हैं
पर काज हित – दूसरों के हित के लिए
संपति सँचहि सुजान – बुद्धिमान लोग धन-संपत्ति को इकट्ठा परोपकार के लिए करते हैं
भावार्थ- रहीम के अनुसार पेड़ अपने फल खुद नहीं खाते, तालाब अपना पानी खुद नहीं पीते। इसी तरह, समझदार लोग अपनी संपत्ति दूसरों की भलाई के लिए रखते हैं, न कि सिर्फ अपने लिए।
कहने का तात्पर्य यह है कि प्रकृति एक जैसी भावना से बिना किसी लालच के सभी को लाभ पहुँचाती है, उसी तरह मनुष्य का स्वभाव भी परोपकारी होना चाहिए अर्थात् दूसरों के हित के लिए होना चाहिए।
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3
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो छिटकाय।
टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय।।
शब्दार्थ-
छिटकाय – झटके से खींचकर
टूटे से फिर ना मिले – टूटने के बाद पहले जैसा नहीं जुड़ता
मिले गाँठ परि जाय – यदि जोड़ भी लिया जाए तो उसमें गाँठ पड़ जाती है
भावार्थ- प्रेम एक नाज़ुक धागे की तरह होता है, इसे तोड़ना नहीं चाहिए। यदि यह धागा टूट जाता है, तो उसे फिर से जोड़ना मुश्किल होता है और जोड़ने पर भी उसमें गाँठ पड़ जाती है, यानी रिश्ता पहले जैसा नहीं रहता।
कहने का तात्पर्य यह है कि लोगों के साथ प्रेम के रिश्ते रखने चाहिए यदि रिश्ता ख़राब होता है तो जितना भी सुधार लो कहीं न कहीं कुछ मनमुटाव रह ही जाता है।
4
रहिमन पानी राखिये, बिनु पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून।।
शब्दार्थ-
पानी राखिये – पानी (सम्मान, विनम्रता, जल) बनाए रखो
बिनु पानी सब सून – पानी के बिना सब कुछ व्यर्थ हो जाता है
पानी गए न ऊबरै – पानी (सम्मान, विनम्रता, जल) एक बार चला जाए तो वापस नहीं आता
चून – आटा
भावार्थ- जीवन में पानी का महत्व सबसे ज्यादा है। पानी के बिना सब कुछ व्यर्थ हो जाता है। चाहे वह मोती हो, इंसान हो, या आटा (चून), पानी के बिना इनका कोई अस्तित्व नहीं रहता।
अन्य शब्दों में रहीम ने ‘पानी’ शब्द को तीन अलग-अलग अर्थों में प्रयोग किया है। पहला अर्थ मनुष्य के संदर्भ में ‘विनम्रता’ से है—मनुष्य को सदैव विनम्र रहना चाहिए, क्योंकि विनम्रता ही उसके व्यक्तित्व को श्रेष्ठ बनाती है। दूसरा अर्थ मोती की आभा या चमक से जुड़ा है—जिस प्रकार बिना चमक के मोती का कोई मूल्य नहीं होता, वैसे ही सम्मान और प्रतिष्ठा के बिना व्यक्ति का महत्व कम हो जाता है। तीसरा अर्थ जल से संबंधित है, जिसे आटे (चून) के संदर्भ में प्रयोग किया गया है—जिस तरह जल के बिना आटा गूँधा नहीं जा सकता और जीवन संभव नहीं है, उसी प्रकार विनम्रता के बिना मनुष्य का कोई वास्तविक मूल्य नहीं होता। इसलिए, मनुष्य को अपने व्यवहार में हमेशा विनम्रता बनाए रखनी चाहिए।
5
रहिमन बिपदाहू भली, जो थोरे दिन होय।
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय।।
शब्दार्थ-
बिपदाहू – विपत्ति (मुसीबत)
भली – अच्छी
थोरे दिन होय – थोड़े समय की
हित अनहित – अच्छे और बुरे, लाभ और हानि
जगत में – संसार में
जानी परत – जानने पर (समझने पर)
सब कोय – सभी लोग
भावार्थ- अगर विपत्ति (मुसीबत) थोड़े समय की हो, तो वह अच्छी होती है, क्योंकि इससे यह पता चलता है कि हमारे सच्चे दोस्त और शत्रु कौन हैं। मुसीबत में ही लोगों की असली पहचान होती है।
अर्थात् मुसीबत के समय में ही सबके बारे में जाना जा सकता है कि संसार में कौन हमारा अच्छा चाहता है और कौन दिखावा करता है।
6
रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गइ सरग पताल।
आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल।।
शब्दार्थ-
जिह्वा – जीभ
बावरी – बावली, मूर्ख, पागल
कहि गइ – कह गई
सरग पताल – स्वर्ग और नर्क (स्वर्ग और नर्क दोनों ही हो सकते हैं)
आपु – खुद
कहि भीतर रही – भीतर ही कहे रहती है (चुपचाप कहती रहती है)
खात – खाती
कपाल – सिर
भावार्थ- हमारी जुबान बहुत विचित्र होती है। यह कुछ भी कह सकती है, जिससे स्वर्ग जैसी खुशी या पाताल जैसी मुसीबत आ सकती है। लेकिन जुबान तो सुरक्षित रहती है, पर इसका बुरा असर हमारे सिर पर (यानी खुद पर) पड़ता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि हमें सोच समझकर बोलना चाहिए, अगर हम सोचते नहीं हैं तो जीभ से कुछ भी शब्द निकल जाते हैं और बाद में पछताना पड़ता है। जीभ तो मुँह के अंदर सुरक्षित रहती है पर बुरा बोलने पर जूते हमारे सर पर ही पड़ते हैं।
7
कहि रहीम संपति सगे, बनत बहुत बहु रीत।
बिपति कसौटी जे कसे, ते ही साँचे मीत।।
शब्दार्थ-
कहि रहीम – रहीम कहते हैं
संपति – धन
सगे – रिश्तेदार
बनत – बनते हैं, बनाना
बहु रीत – कई तरीके
बिपति – विपत्ति, मुसीबत
कसौटी – कसौटी, परखने का तरीका
जे कसे – जो कसते हैं, जो परखते हैं
ते ही – वही
साँचे – असली, सच्चे
मीत – मित्र, दोस्त
भावार्थ- धन-संपत्ति के समय बहुत से रिश्तेदार और दोस्त साथ आ जाते हैं और कई तरीके से रिश्ता निभाते हैं। लेकिन सच्चे मित्र वही होते हैं जो कठिन समय में हमारे साथ खड़े रहते हैं, क्योंकि विपत्ति ही असली मित्र की पहचान करवाती है।
अर्थात् जब हमारे पास बहुत धन होता है तब बहुत से लोग रिश्ता जोड़ना शुरू कर देते हैं। सोना शुद्ध है या ख़राब, इसकी परख कसौटी पर घिसने से ही होती है। इसी प्रकार मुसीबत के समय में जो हर तरह से साथ देता है, वही सच्चा मित्र होता है।
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