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Kavita -Swadesh, Vyakhya,Class 8,Malhar

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Kavita Swadesh -Vyakhya

Kavita Swadesh -Vyakhya

कविता – स्वदेश

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      व्याख्या

वह हृदय नहीं है पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।
जो जीवित जोश जगा न सका,
उस जीवन में कुछ सार नहीं।

जो चल न सका संसार-संग,
उसका होता संसार नहीं॥
जिसने साहस को छोड़ दिया,
वह पहुँच सकेगा पार नहीं।

 

शब्दार्थ-
हृदय– दिल, मन                   स्वदेश– अपना देश
सार– महत्व, मूल्य                 साहस- हिम्मत, बहादुरी
पार- सफलता तक पहुँचना, मंज़िल तक पहुँचना

 

व्याख्या– प्रस्तुत पँक्तियों में कवि कहते हैं कि जिस हृदय में अपने देश के लिए प्रेम नहीं हैए वह पत्थर के समान है। यानी उसमें कोई भावना नहीं है। ऐसा जीवन जिसमें कोई उत्साह और जोश नहीं है। वह व्यर्थ है अर्थात् ऐसा व्यक्ति जिसके हृदय में देशभक्ति के लिए जोश नहीं है उसका जीवन व्यर्थ है।

कवि आगे कहता है कि जो व्यक्ति दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चलता वह समाज में अपना स्थान नहीं बना सकता। जो लोग साहस छोड़ देते हैं। वे अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकते अर्थात् जो व्यक्ति हार मान लेते हैं वे जीवन में आगे नहीं बढ़ पाते।

जिससे न जाति- उद्धार हुआ,
होगा उसका उद्धार नहीं
जो भरा नहीं है भावों से,
बहती जिसमें रस-धार नहीं।

वह हृदय नहीं है पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं

शब्दार्थ-
जाति– समाज, समुदाय
उद्धार- भलाई, उन्नति, कल्याण
भावों- भावनाओं, संवेदनाओं
रस-धार– भावनाओं की मधुर धारा, प्रेम की लहर

 

व्याख्या- प्रस्तुत पँक्तियों में कवि कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने समाज और जाति का उद्धार नहीं कर सका, उसका स्वयं का भी उद्धार नहीं हो सकता। अगर किसी व्यक्ति के हृदय में कोमल भावनाएँ और प्रेम नहीं है, तो वह जीवन व्यर्थ है। जिस हृदय में अपने देश के प्रति प्यार नहीं है, वह संवेदनहीन पत्थर के समान है। 

 

जिसकी मिट्टी में उगे बढ़े,
पाया जिसमें दाना-पानी।
हैं माता-पिता बंधु जिसमें,
हम हैं जिसके राजा-रानी

जिसने कि खजाने खोले हैं,
नव रत्न दिये हैं लासानी।
जिस पर ज्ञानी भी मरते हैं,
जिस पर है दुनिया दीवानी

शब्दार्थ-
दाना-पानी– भोजन और पानी, जीवन-निर्वाह के साधन
बंधु– भाई-बंधु, रिश्तेदार             खजाने– धन-सम्पत्ति
नव रत्न– नए और अनमोल रत्न       ज्ञानी- विद्वान व्यक्ति
लासानी– अनोखे, बेजोड़, जिनकी कोई तुलना न हो
 

व्याख्या- प्रस्तुत पँक्तियों में कवि उस भूमि की महिमा गाता है जहाँ हम जन्मे हैं, पले-बढ़े हैं और जिसने हमें अन्न-पानी दिया है। यही भूमि हमारे माता-पिता और संबंधियों की भूमि है। हम इसी देश के नागरिक हैं और यहीं राजा-रानी जैसे जीते हैं। इस देश ने हमें अनमोल खजाने और ज्ञान के रत्न दिए हैं। भारत की संस्कृति, ज्ञान और परंपरा इतनी महान है कि पूरी दुनिया इसे सराहती है।

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उस पर है नहीं पसीजा जो,
क्या है वह भू का भार नहीं।
निश्चित है निस्संशय निश्चित,
है जान एक दिन जाने को ।

है काल- दीप जलता हरदम,
जल जाना है परवानों को।
सब कुछ है अपने हाथों में,
क्या तोप नहीं तलवार नहीं।

वह हृदय नहीं है, पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं ॥

 

शब्दार्थ-
पसीजा– दया आना, कोमल भावना जागी

भू- धरती, पृथ्वी
निश्चित- तय, पक्का
निस्संशय- बिना संदेह के, निश्चित रूप से
जान- प्राण, जीवन
काल-दीप– मृत्यु का प्रतीक दीपक, समय की जलती लौ
हरदम– हमेशा, निरंतर
परवानों– दीवाने, बलिदान देने वाले
तोप– युद्ध में प्रयोग होने वाला भारी हथियार

 

व्याख्या- प्रस्तुत पँक्तियों में कवि कहते हैं कि जिस व्यक्ति के ह्रदय में देश के प्रति करुणा और प्रेम का भाव नहीं है वह वास्तव में इस धरती पर एक बोझ है। कवि आगे कहते हैं कि यह तो सभी को पता है कि मृत्यु निश्चित है तो क्यों न देश की सेवा करें, ऐसा जीवन जिएँ जो देश के काम आए। जैसे दीपक में परवाना जल जाता है, वैसे ही देशभक्त जीवन की आहुति देकर देश की सेवा करते हैं। हमारे पास सब कुछ है, हथियार, साहस और बलिदान की शक्ति। इसलिए अगर किसी के हृदय में देशप्रेम नहीं है, तो वह हृदय नहीं, पत्थर है।

 

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