Question Answer,Prashnottar, Do Gauriya, दो गौरैया,Class 8, Malhar
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दो गौरैया
Do Gauraiya Extra Question Answers (अतिरिक्त प्रश्न उत्तर)
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प्रश्न 1 – लेखक के पिता अपने घर को सराय क्यों कहते थे?
उत्तर – लेखक अपने घर का जिक्र करते हैं कि उनके घर में तीन ही व्यक्ति रहते थे – उनकी माँ, उनके पिताजी और स्वयं लेखक। परन्तु लेखक के पिताजी कहते थे कि उनका घर यात्रियों के ठहरने का स्थान बना हुआ है। वे तो जैसे घर में मेहमान हैं और घर के मालिक तो कोई दूसरे ही हैं। क्योंकि लेखक के घर के आँगन में एक आम का पेड़ था। उस पर तरह-तरह के पक्षी अपना बसेरा डाले रहते थे। लेखक के पिताजी कहते थे कि जो भी पक्षी पहाड़ियों या घाटियों से उड़ता हुआ दिल्ली पहुँचता है, वह सीधा उनके घर ऐसे पहुँच जाता है, जैसे उनके घर का पता कहीं से लिखवाकर लाया हो। उस आम के पेड़ पर कभी तोते पहुँच जाते थे, तो कभी कौवे और कभी तरह-तरह की गौरैयाँ वहाँ अपना घर बना देती थी। जैसे घर के बाहर पक्षियों ने अपना बसेरा बनाया हुआ था वैसे ही लेखक के घर के अंदर का हाल था। उनके घर में बहुत अधिक चूहे रहते थे। लेखक के घर में बिल्ली नहीं रहती थी मगर लेखक का घर उसे भी पसंद था क्योंकि वह कभी-कभी लेखक के घर में झाँक लेती थी। शाम होते ही दो-तीन चमगादड़ कमरों के आर-पार अपने पर फैलाकर मानो व्यायाम करते थे। घर में कबूतर भी थे। इतने पशु-पक्षी होने पर भी लेखक के घर में छिपकलियाँ भी थी और ततैया भी थे और चींटियों की फौज ने तो मानो लेखक के घर में डेरा ही डाल रखा था।
प्रश्न 2 – गौरैयों ने लेखक के घर में कहाँ अपना बसेरा बनाया ?
उत्तर – एक दिन लेखक के घर में दो गौरैया सीधी अंदर घुस आईं और बिना पूछे इधर-उधर उड़-उड़कर मानो मकान देखने लगीं। लेखक के पिताजी कहने लगे कि वे मकान को गौर से देख रही है कि वह उनके रहने योग्य है भी कि नहीं। कभी वे किसी रोशनदान पर जा बैठतीं, तो कभी खिड़की पर और फिर जैसे आई थीं वैसे ही उड़ कर चली भी गई। परन्तु दो दिन बाद लेखक और उनके माता-पिता ने देखा कि उनकी बैठक की छत में लगे पंखे के गोले में उन गौरैयों ने अपना बिस्तर बिछा लिया था और वे अपना सामान भी ले आईं थी और मजे से दोनों बैठी गाना गा रही थी। उन्हें देखकर लगता था कि उन्हें घर पसंद आ गया था।
प्रश्न 3 – ‘अब गौरैयाँ ने घौंसला बना लिया है और अब वे नहीं जाएंगीं’ माँ की इस बात पर पिताजी की क्या प्रतिक्रिया थी ?
उत्तर – लेखक के माँ और पिताजी दोनों सोफे पर बैठे गौरैयों की ओर देखे जा रहे थे। थोड़ी देर बाद लेखक की माँ ने सिर हिलाकर कहा कि अब तो वे गौरैयाँ नहीं उड़ेंगी। यदि पहले उन्हें उड़ा देते, तो वे उड़ जातीं। अब तो उन्होंने छत के पंखें के गोले में अपना घोंसला बना लिया था। अर्थात यदि घौंसला बनाने से पहले उन्हें उड़ाते तो वे उड़ जाती परन्तु घौंसला बनाने के बाद उन्हें उड़ाना सही नहीं है। उनकी बात सुनकर लेखक के पिताजी को गुस्सा आ गया। वह उठ खड़े हुए और बोले कि देखता हूँ ये कैसे यहाँ रहती हैं! उनके आगे गौरयाँ क्या चीज हैं! वे अभी गौरयाँ को बाहर निकाल देंगे।
प्रश्न 4 – पिता जी ने गौरैयों को भगाने के क्या-क्या प्रयास किए ?
उत्तर – जब कभी भी लेखक की माँ कोई बात मजाक में कहती थी, तो लेखक के पिताजी चीड़ जाते थे। उन्हें हमेशा लगता था कि लेखक की माँ उनका ही मजाक उड़ाती है। इसी कारण वे तुरंत उठ खड़े हुए और पंखे के नीचे जाकर जोर से ताली बजाने लगे और मुँह से ‘श… शू’ की आवाज के साथ ही, बाँहें हिलाने लगे, फिर खड़े-खड़े कूदने लगे, कभी बाँहें हिलाते, कभी ‘श… शू’ करके गौरैयों को भगाने की कोशिश करने लगे। लेखक के पिता जी गौरैयाँ को निकालने की ठान चुके थे इसलिए बाहर से बड़ा डंडा उठा लाए। लेखक के पिता जी ने बड़े डंडे को ऊँचा उठाया और पंखे के गोले को चोट करने लगे।
प्रश्न 5 – लेखक की माँ गौरैयों को क्यों नहीं भगाना चाहती थी ?
उत्तर – जब लेखक के पिता जी गौरैयाँ को भगाने की कोशिश कर रहे थे तब गौरैयाँ घोंसले में से निकलकर दूसरे पंखे के पंख पर जा बैठीं थी। उन्हें देखकर लग रहा था जैसे उन्हें लेखक के पिताजी का नाचना-कूदना बहुत पसंद आ रहा था। पिता जी की हरकतों को देखकर लेखक की माँ हँसते हुए कहने लगी कि ये नहीं निकलेंगी क्योंकि अब इन्होंने घौंसले में अंडे दे दिए होंगे।
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प्रश्न 6 – जब-जब लेखक के पिता गौरैयों को बाहर निकालते तो वे किस तरह वापिस अंदर आ जाती?
उत्तर – जब लेखक के पिता ने बड़े डंडे को ऊँचा उठाया और पंखे के गोले को चोट करने लगे। ‘चीं-चीं करती हुई गौरैयाँ उड़कर पर्दे के डंडे पर जा बैठीं।लेखक के पिताजी डंडे को उठाए पर्दे के डंडे की ओर जल्दी-जल्दी पैर उठाते हुए तेजी से आगे बढ़े। अब एक गौरैया उड़कर किचन के दरवाजे पर जा बैठी और दूसरी सीढ़ियों वाले दरवाजे पर। जब दरवाजे बंद कर दिए केवल किचन वाला दरवाजा खुला रहा। तो पिता जी के हमलों से बचती हुई चीं-चीं करती चिड़ियाँ कभी एक जगह तो कभी दूसरी जगह जा बैठतीं। आखिर में दोनों किचन की ओर खुलने वाले दरवाजे में से बाहर निकल गई। लेखक के पिता जी ने आदेश दिया कि आज दरवाजे बंद रखो। तभी पंखे के ऊपर से फिर से चीं-चीं की आवाज सुनाई पड़ी। देखा, तो पाया कि दोनों गौरैयाँ फिर से अपने घोंसले में मौजूद थीं। माँ ने कहा कि वे दरवाजे के नीचे से आ गई हैं। लेखक के पिताजी एक साथ पूरी ताकत और दृढ़ संकल्प के साथ गौरैयों पर हमला करने लगे। उन्होंने दरवाजों के नीचे कपड़े घुसा दिए ताकि कहीं कोई छेद न बचा रह जाए। चिड़ियाँ भी चीं-चीं करती फिर बाहर निकल गई। पर थोड़ी ही देर बाद वे फिर से कमरे में मौजूद थीं। इस बार वे रोशनदान में से आ गई थीं क्योंकि उसका एक शीशा टूटा हुआ था। जिसमें से चिड़ियाँ आराम से निकलकर अंदर आ सकती थी।
प्रश्न 7 – बार-बार गौरैयों को भगाने से परेशान होकर पिता जी ने क्या निर्णय लिया?
उत्तर – दिन में तो गौरैयाँ बाहर निकाल दी जाती पर रात के समय जब सभी सो रहे होते, तो न जाने किस रास्ते से वे अंदर घुस आतीं थी। लेखक के पिताजी अब उनसे परेशान हो उठे थे। आखिर कोई कहाँ तक लाठी झुला सकता है? लेखक के पिताजी भले ही बार-बार यह कहते थे कि वे हार मानने वाला आदमी नहीं हैं। परन्तु आखिर वे भी हर दिन चिड़ियों को भगाते-भगाते तंग आ गए थे। आखिर जब उनका सब्र समाप्त हो गया तो वे कहने लगे कि वे अब गौरैयों का घोंसला ही नोचकर निकाल देंगे। इतना कहकर वे तुरंत ही बाहर से एक स्टूल उठा लाए। ताकि वे चिड़ियों का घौंसला ही नष्ट कर दें।
प्रश्न 8 – घौंसला तोड़ते हुए अचानक लेखक के पिता क्यों रुक गए ?
उत्तर – लेखक के पिताजी डंडे के सिरे को घास के तिनकों के ऊपर रखे रखे घुमाने लगे। सूखी घास और रुई के लच्छे और धागे और पैबंद आदि डंडे के सिरे पर लिपटने लगे। तभी अचानक फिर से जोर की आवाज आई, ‘चीं-चीं चीं-चीं!!! जब उनके पिता जी ने घौंसला तोड़ते हुए ची-ची की आवाज सुनी तो उनके हाथ अचानक से रुक गए। वे सोचने लगे कि क्या गौरैयाँ फिर से लौट आई। लेखक ने भी जल्दी से बाहर की ओर देखा, वहाँ दोनों गौरैयाँ बाहर दीवार पर दुखी सी चुपचाप बैठी हुई थीं। “चीं-चीं चीं-चीं!” फिर आवाज आई। लेखक ने ऊपर की ओर देखा। तो पंखे के गोले के ऊपर से नन्हीं-नन्हीं गौरैयाँ सिर निकाले नीचे की ओर देख रही थीं और चीं-चीं किए जा रही थीं। लेखक हैरान हो कर उनकी ओर देखता रहा। फिर लेखक ने देखा, कि उनके पिताजी स्टूल पर से नीचे उतर आए थे।
प्रश्न 9 – लेखक के पिता जी ने घौंसला न तोड़ने का निर्णय क्यों लिया?
उत्तर – लेखक के पिता ने घोंसले के तिनकों में से लाठी निकालकर लाठी को एक ओर रख दिया था और चुपचाप कुर्सी पर आकर बैठ गए थे। ऐसा लग रहा था जैसे उन्हें पछतावा हो रहा हो। इस बीच लेखक की माँ कुर्सी पर से उठीं और सभी दरवाजे खोल दिए। नन्हीं चिड़ियाँ अभी भी हाँफ हाँफकर चिल्लाए जा रही थीं और अपने माँ-बाप को बुला रही थीं। उनके माँ-बाप जल्दी से उड़कर अंदर आ गए और चीं-चीं करते अपने बच्चों से जा मिले और उनकी नन्हीं-नन्हीं चोंचों में दाना डालने लगे। माँ पिताजी और लेखक उनकी ओर देखते रह गए। अब फिर से कमरे में शोर होने लगा था, पर अबकी बार लेखक के पिताजी उन गौरैयों की ओर देख-देखकर केवल मुसकराते जा रहे थे। मानो उन्हें ख़ुशी हो रही हो कि समय रहते घौंसला टूटने से बच गया और उन्होंने एक परिवार को बेघर नहीं किया।
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