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जलाते चलो

जलाते चलो

 

 

 

 

प्रश्न 1 – ‘जलाते चलो ये दिये स्नेह भर-भरकवि ने ऐसा क्यों कहा है?
उत्तर – जलाते चलो ये दिये स्नेह भर-भर’ से आशय यह है कि यदि हम दिए जलाते रहेंगे तो कभी न कभी इस धरती का अन्धकार अवश्य मिट जाएगा। अर्थात कवि लोगों को ज्ञान रूपी दीयों में प्रेम रूपी तेल भर-भर कर डाल कर जलाने को प्रेरित कर रहा है क्योंकि कवि के अनुसार ज्ञान और प्रेम से कभी न कभी तो इस धरती की नफ़रत और बुराइयाँ समाप्त होंगी।

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प्रश्न 2 – कवि के अनुसार विज्ञान की उन्नति क्यों सफल नहीं है?
उत्तर  कवि के अनुसार भले ही विज्ञान में अमावस्या को भी पूर्णिमा जैसा प्रकाशमान बनाने की शक्ति विध्यमान है, परन्तु वर्तमान में दिन के समय ही ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे अमावस्या जैसा अन्धकार घिर रहा है। कहने का अभिप्राय यह है कि आज विज्ञान ने इतनी उन्नति कर ली है कि अमावस्या जैसी अँधेरी रात में पूर्णिमा जैसा उजाला करना संभव है। विज्ञान ने अनेक सुख-सुविधाओं का निर्माण किया है। परन्तु इतना उन्नत होने पर भी आज विश्व में अमावस्या जैसा अन्धकार फैला हुआ है, अर्थात प्रकृति से लगातार खिलवाड़ करने व् विनाशकारी हथियारों के निर्माण के कारण हर ओर दुःख व् निराशा का माहौल है।

प्रश्न 3 – कवि ने क्या बुझाने को कहा है और क्यों?
उत्तर – बिना प्रेम के बिजली के जो दिए जल रहे हैं कवि इन्हें बुझा देने को कह रहा है क्योंकि इनसे रास्ता नहीं मिल सकेगा। कहने का आशय यह है कि आज विज्ञान ने रोशनी फैलाने वाले कई उपकरण बना दिए हैं। उन उपकरणों से कृत्रिम प्रकाश तो मिल सकता है किन्तु सही रास्ता दिखाने वाला ज्ञान रूपी प्रकाश नहीं मिल सकता। इसलिए कवि उन्हें बुझा कर ज्ञान रूपी प्रकाश वाले दीपक जलाने को कह रहा है।

प्रश्न 4 – मनुष्यों ने अन्धकार की चुनौती कैसे स्वीकार की थी और कवि मनुष्यों से क्या चाहता है?
उत्तर – जब अन्धकार ने चुनौती दी थी तब तुम मनुष्यों ने ही पहली बार दीप जलाकर उसकी चुनौती को स्वीकार किया था। अन्धकार की नदी को पार करने के लिए मनुष्यों ने ही तो दीप की नाव बना कर तैयार की थी। कहने का आशय यह है कि प्राचीन काल से मनुष्यों ने ही तो अज्ञान रूपी अन्धकार की चुनौती स्वीकार की है। अज्ञान रूपी अन्धकार व् निराशा की नदी को पार करने के लिए प्रेम व् आशा रूपी नाव भी मनुष्यों ने ही तैयार की थी। कवि चाहता है कि अज्ञान रूपी अंधकार की नदी को पार करने के लिए मनुष्यों ने जो ज्ञान रूपी दिए से नाव बनाई है उस नाव को लगातार चलाते रहे, कभी न कभी तो अज्ञान रूपी अन्धकार की नदी का किनारा मिल ही जाएगा। कहने का आशय यह है कि ज्ञान के रास्ते पर चलते-चलते एक न एक दिन अज्ञान से मुक्ति मिल ही जाती है इसलिए कवि लगातार ज्ञान के पथ पर चलने को कह रहा है।

प्रश्न 5 – समय किस बात का गवाह रहा है?
उत्तर – प्राचीन काल से अज्ञान, स्वार्थ व् लालच जैसी बुराइयों से परिपूर्ण अन्धकार की चट्टान पर मनुष्यों ने ज्ञान व् संघर्ष के दिप जलाए हैं। इस बात का समय गवाह रहा है कि मनुष्य के उन ज्ञान व् संघर्ष के दीयों को अज्ञान, स्वार्थ व् लालच रूपी हवाओं ने बुझाया है। कहने का आशय यह है कि ज्ञान व् संघर्ष को अज्ञान, लालच, स्वार्थ जैसी बुराइयाँ अक्सर मिटाने का प्रयास करती रहती हैं।

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प्रश्न 6 – अज्ञान रूपी हवाओं ने बेशक ज्ञान रूपी दिया बुझा दिया परन्तु स्वयं बुझ कर भी उन दीपकों ने ज्ञान रूपी प्रकाश फैलाया। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर  ज्ञान रूपी दीपकों को अज्ञान रूपी हवाओं ने बेशक बुझा दिया परन्तु स्वयं बुझ कर भी उन दीपकों ने ज्ञान रूपी प्रकाश फैलाया। कहने का आशय यह है कि ज्ञान रूपी मार्ग दिखाने वाले महापुरुषों को अज्ञानी व् पाखंडियों ने मरवा दिया या झूठा साबित कर दिया जिसके कारण कई विरोधियों ने हम पर शासन किया किन्तु उन्हीं महापुरुषों के ज्ञान को सीख रूप में लेकर नई पीढ़ियों ने अज्ञान रूपी अन्धकार को ज्ञान रूपी उजाले में परिवर्तित किया।

प्रश्न 7 – दिए और तूफान की क्या कहानी है?
उत्तर – दिए और तूफान की कहानी सदियों से चली आ रही है और आगे भी चलती रहेगी। और जो ज्ञान रूपी दीप की पहली सोने के सामान रौशनी थी वह आज भी जल रही है और आगे भी जलती रहेगी। कहने का आशय यह है कि संघर्ष और प्रेम की कहने सदियों पुरानी है और या भविष्य में भी चलती रहेगी क्योंकि संघर्ष और प्रेम व् आशा जीवन के दो पहलू हैं। ज्ञान रूपी दिए से जो उम्मीद रूपी प्रकाश निकला था उसकी चमक सोने के सामान हमेशा रहेगी क्योंकि ज्ञान कभी समाप्त नहीं होता। ज्ञान सदैव चमकता रहता है। यदि धरती पर एक भी ज्ञान रूपी दिया प्रेम रूपी तेल से भरा रहेगा वह अज्ञान रूपी रात को उम्मीद रूपी सवेरा दिखाता रहेगा।

 

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